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Aalsi Beta

Aalsi Beta | आलसी बेटा

कहानी 'आलसी बेटा'

एक गांव में एक बहुत ही धनी किसान रहा करता था जो बहुत ही परिश्रमी तथा स्वभाव से बहुत ही सरल था, वह अपनी पत्नी और एकमात्र बेटे विपिन के साथ गांव में बहुत ही शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा था।

किसान बहुत ही मेहनती था इसलिए रोज सुबह सवेरे जल्दी उठकर अपने खेतों की देखरेख करने जाया करता था, परंतु उसका बेटा विपिन बहुत ही आलसी था और कभी भी अपने पिता के साथ खेतों की तरफ नहीं जाता था।

जब किसान दिन चढ़ने पर खेतों के सब कामों से निवृत्त होकर अपने घर वापस लौटता था तो उसको अपना आलसी बेटा बिस्तर पर सोता हुआ ही मिलता था। वह अपने बेटे की इस हालत से बहुत ही परेशान होने लगा था और रोज सवेरे विपिन को जाने से पहले अपने साथ चलने के लिए कहता था कि “चलो बेटा तुम भी मेरे साथ कारोबार में हाथ बढ़ाना”।

लेकिन विपिन रोज उससे यह कहकर टाल दिया करता था कि “पिताजी आज नहीं कल मैं अवश्य ही आपके साथ चलूंगा”, उसकी यह बातें सुनकर वह किसान बहुत दुखी हो जाता था और सोचता था “मेरा इतना मेहनत से बनाया हुआ यह खेती का कारोबार है परंतु मेरा बेटा है जो इसमें रूचि ही नहीं लेता”।

इस तरह दिन बीतते गए और एक दिन अचानक किसान की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो जाती है और उसकी असमय ही मृत्यु हो जाती है, इसके उपरांत उनके व्यापार में देखरेख करने वाला कोई नहीं रहता क्योंकि विपिन तो पहले से ही खेती और कारोबार में किसी तरह की रुचि नहीं लेता था।

इस तरह उस किसान के व्यापार में दिन पर दिन बहुत ही गिरावट आने लगती है जिससे परेशान होकर विपिन की मां विपिन से एक दिन कहती है “बेटा तुम्हारे पिताजी अब नहीं है, यह सारी खेती व व्यापार उन्होंने बड़ी ही मेहनत से खड़ा किया था परंतु उनके जाने के उपरांत हमारे व्यापार में दिन पर दिन हानि ही होती जा रही है”।

माँ अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती है “अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो बेटा तुम्हारे पिताजी का इतनी मेहनत से खड़ा किया हुआ व्यापार व खेती कुछ ही दिन में बर्बाद हो जाएगा, अब तुम्हें अपने पिताजी का यह व्यापार बचाने के लिए अवश्य ही कुछ करना चाहिए”।

माँ की यह बात सुनकर विपिन थोड़ी निराशा जताते हुए कहता है ”मां आप तो यह भली भाँती जानती हो कि मुझे तो व्यापार की कुछ समझ ही नहीं है क्योंकि समय रहते मैंने पिता जी के साथ कभी हाथ नहीं बटाया। इस कारण से मुझे खेती व बाकी सारे कारोबार की कुछ समझ नहीं है तो अब तुम्ही बताओ कि मैं कैसे उनका व्यापार संभाल सकता हूं”।

इस पर उसकी मां बड़ी ही धीरता से उससे कहती है “जो हो चुका उसके बारे में सोचकर चिंता मत करो बेटा, पास के ही गांव में तुम्हारे दादाजी रहते हैं उन्हें खेती व कारोबार की बहुत ही अच्छी समझ है। तुम जल्द ही उनके पास जाकर उनसे वे सभी कुछ सीख सकते हो जो तुम अपने पिताजी से नहीं सीख पाए और फिर अपने व्यापार व खेती को संभाल सकते हो। मुझे पूरा विश्वाष है कि वे अवश्य ही तुम्हारी मदद करेंगे”।

अपनी माँ की बातें सुनकर विपिन को भी थोड़ा साहस आया और वह बोला “ठीक है मां, मैं कल सुबह ही उनके पास जरूर जाऊंगा” और फिर अगले दिन सुबह ही वह पास के गांव में अपने दादा दादी के पास जाता है।

उनसे मिलने के उपरांत वह उन्हें अपनी परेशानी के बारे में सब कुछ बताता है कि कैसे पिताजी के जाने के बाद हमें व्यापार में बहुत ही घाटा हो रहा है क्योंकि समय रहते उसने उनका कहा नहीं माना और खेती व कारोबार में कभी रूचि नहीं दिखाई जिसके कारण आज के समय में उसे इनकी कुछ भी समझ नहीं है।

विपिन की सारी बातें सुनकर उसके दादा जी उससे कहते हैं “कोई बात नहीं बेटा, अभी भी कोई बहुत ज्यादा देर नहीं हुई है मै तुम्हे सब प्रकार की बातें भली भाँती सिखा दूंगा लेकिन अब बस तुम्हें सावधानीपूर्वक कार्य करना होगा, विवेक तथा लगन से किसी भी मुश्किल का सामना किया जा सकता है”।

विपिन ने अपने दादाजी की बातों से सहमती जताते हुए उन्हें भरोसा दिलाया की अब वह पूरी लगन व मेहनत से कार्य करेगा और उन्हें किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं देगा। अब विपिन पहले जैसा आलसी नहीं रहा था, वह रोज सवेरे ही खेत पर जाकर उनकी निगरानी किया करता था तथा अपने कारोबार पर भी पूरा ध्यान देने लगा था।

अपने दादाजी की सिखाई गयी बातों पर विपिन बहुत ही बारीकी से ध्यान देने लगा था और सभी कार्यो को लगन व मेहनत से सीख रहा था, हर चीज पर वह सावधानी से नजर रख रहा था जिससे उसके मजदूर अब बातें करने लगे थे कि अब हमारी मनमानी नहीं चलेगी अब हमें मेहनत से काम करना होगा वरना हमें निकाल दिया जाएगा।

इस तरह इस बार उन्हें किसी भी तरह का घाटा नहीं उठाना पड़ा और कुछ ही समय में उनका मुनाफा धीरे-धीरे फिर से बढ़ने लगा, विपिन ने अब अपने खेतों व व्यापार को सही तरह से संभाल लिया था जिसे देखकर उसकी मां बहुत ही खुश हुई।

माँ ने उससे कहा “बेटा अब तुमने अपने पिताजी के व्यापार को ठीक से सीख लिया है जिसमे तुम्हारे दादा जी ने तुम्हारी बहुत मदद की है इसलिए तुम्हें अपने दादाजी के पास जाकर भी सब बताना चाहिए और उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए क्योंकि उनके कारण ही तुम्हे सही मार्गदर्शन मिला है, तुम्हारे दादा जी ने ही तुम्हें व्यापार की बारीकियां सिखाई हैं”।

जब विपिन अपने दादाजी का शुक्रिया अदा करने गया तो दादाजी बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे “बेटा यह सब तुम्हारे ही कारण हुआ है क्योंकि तुमने अब ना केवल अपने काम को देखना शुरू कर दिया है बल्कि उस पर ध्यान देना भी शुरू कर दिया है जिसके कारण मजदूरों को पता चल चुका है कि अब हमारी मनमानी नहीं चलेगी इसलिए उन्होंने भी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया है”।

दादाजी की बातों को सुनकर विपिन को मेहनत व लगन का महत्व अच्छी तरह से समझ आ चुका था और अपनी सफलता को देखकर उसे यह विश्वास भी हो चुका था पूरी तत्परता व समझदारी से की गयी मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने द्वारा किये गए प्रत्येक कार्य में हमेशा मेहनत करनी चाहिए और आलस से से बचना चाहिए क्योंकि आलस्य हमारा जीवन खराब कर देता है, कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हमें हमारी लगन व विवेकपूर्ण किया गया कार्य ही सहारा देता है।