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Imaandar Lakadhara

Imaandar Lakadhara | ईमानदार लकड़हारा

कहानी 'ईमानदार लकड़हारा'

सुन्दर नगर राज्य में एक बहुत मेहनती लकड़हारा रहता था जो लकड़िया बेच कर अपने परिवार का गुजारा चलाता था, वह हर रोज एक पास के जंगल में एक नदी के पास लकड़ी काटने जाता था

एक दिन वह लकड़हारा नदी किनारे पेड़ के ऊपर चढ़ कर लकड़ी काट रहा था कि अचानक उसकी कुल्हाड़ी नीचे बह रही नदी में जा गिरी, इस पर वह लकड़हारा बहुत परेशान हुआ और वहीं पेड़ से नीचे आकर नदी के किनारे बैठ कर जोर-जोर से रोने लगा

वह बेचारा लकड़हारा वहीं नदी के पास किनारे पर बैठकर कहने लगा ‘हे भगवान मेरा पूरा परिवार मेरे इस रोजगार के ऊपर आश्रित है और मैं तो कुल्हाड़ी से ही पेड़ की लकड़ियां काटकर अपना घर चलाता था, अब मै लकड़ियाँ कैसे काटूँगा और मेरे घर का गुजारा कैसे चलेगा’।

वह लगातार रो रहा था और कह रहा था ‘हे प्रभु, अब मैं क्या करूँगा। मैं तो रोज यहाँ जंगल से लकड़ियाँ काट कर ले जाता था और उन लकड़ियों से जो पैसे मिलते उन से अपने बच्चों का पेट पालता था, अब मेरे बच्चों का पेट कैसे भरेगा’।

यह सब बातें उस नदी में विराजमान जल देवी सुन रहीं थीं, उस किसान को परेशान देख जल देवी को दया आ गई और वह वहां रो रहे लकड़हारे के सामने पानी में प्रगट हो गयीं, जल देवी उससे कहने लगीं ‘मनुष्य तुम रो क्यों रहे हो’।

अपने सामने प्रकट हुई जल देवी को देखकर पहले तो लकड़हारा हैरान रह गया लेकिन फिर खुद को सँभालते हुए देवी से रोते हुए बोला ‘हे देवी, मैं यहाँ पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ काट रहा था कि अचानक मेरी कुल्हाड़ी हाथों से फिसलकर इस नदी में गिर गई है’।

‘मेरी वह कुल्हाड़ी जो मेरा बहुत बड़ा सहारा थी उससे मैं रोज लकड़ी काटता था और उन लकड़ियों को बेचकर मैं अपने परिवार का पेट पालता था, अब मेरे परिवार का क्या होगा यही सोच कर मुझे बहुत चिंता हो रही है’, यह कहकर वह अपना सिर पकड़कर बैठ गया।

उसकी सारी बात सुनकर जलदेवी लकड़हारे से बड़े ही प्रेम से बोलीं ‘हे मनुष्य, तुम परेशान ना हो। मैं अभी तुम्हारी कुल्हाड़ी लाकर तुम्हें दे देती हूं’, यह कहते हुए जल देवी ने एक नदी में एक डुबकी लगाई और अपने हाथ में एक सोने की कुल्हाड़ी लेकर प्रकट हुई

देवी ने लकड़हारे से पूछा ‘मनुष्य, देखो क्या यही तुम्हारी कुल्हाड़ी है’, उस कुल्हाड़ी को देख लकड़हारा थोड़ा निराश होकर बोला ‘नहीं देवी जी, यह तो सोने की कुल्हाड़ी है, यह कुल्हाड़ी मेरी नहीं है’।

यह सुनकर जलदेवी कहने लगी ‘अच्छा तो ठीक है, मैं तुम्हारी कुल्हाड़ी डूंड कर लाती हूं और देवी ने फिर से नदी में एक डुबकी लगाई और इस बार चांदी की कुल्हाड़ी लाकर लकड़हारे से कहने लगी ‘क्या यही तुम्हारी कुल्हाड़ी है’।

इस बार उनके हाथ में चांदी की कुल्हाड़ी को देखकर लकड़हारा काफ़ी ज्यादा निराश हो गया और कहने लगा ‘नहीं – नहीं देवीजी, यह भी मेरी नहीं है यह तो चांदी की कुल्हाड़ी है। लगता है अब मेरी कुल्हाड़ी कभी नहीं मिल पाएगी’।

लकड़हारे के मुख से यह बात सुनकर पहले तो जलदेवी थोड़ा मुस्कुराई और फिर उससे बोली ‘तुम चिंता ना करो, इस बार मैं तुम्हारी कुल्हाड़ी ढूंढने की पूरी कोशिश करुँगी’, यह कहकर देवी ने फिर से नदी में डुबकी लगाई और इस बार वह लोहे की कुल्हाड़ी लेकर वापस आई और लकड़हारे से कहने लगी ‘देखो मनुष्य, क्या यही तुम्हारी कुल्हाड़ी है’।

जलदेवी के हाथों में उस कुल्हाड़ी को देखकर लकड़हारा खुश हो गया और कहने लगा ‘हां-हां देवीजी, यही मेरी कुल्हाड़ी है’ और खुशी-खुशी उस कुल्हाड़ी को लेने के लिए तैयार हो गया।

निर्धनता और मुसीबत से घिरे लकड़हारे की यह इमानदारी देख जलदेवी को बहुत ही प्रसन्नता हुई और वह उससे कहने लगी ‘हे मनुष्य, तुम बहुत ही ईमानदार हो और मैं तुम पर बहुत ही प्रसन्न हूँ इसलिए तुम अपनी कुल्हाड़ी के साथ-साथ यह दोनों सोने और चाँदी की कुल्हाड़ी भी ले कर जा सकते हो’।

यह सुन कर लकड़हारा बहुत खुश हुआ और उसने जलदेवी को बार – बार धन्यवाद दिया खुशी-खुशी उन तीनों कुल्हाडियों को अपने घर ले गया। सोने और चांदी की दोनों कुल्हाडियों को बेचकर लकड़हारे की निर्धनता भी दूर हो गयी जिसे उसके दोस्त उससे पूछने लगे की यह सब कैसे हुआ, उसके पास इतना धन कैसे और कहाँ से आ गया।

उनके बार – बार पूछने पर लकड़हारे ने अपने दोस्तों को बताया कि उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गयी थी तो नदी की जलदेवी ने उसे उसकी कुल्हाड़ी के साथ – साथ सोने और चांदी की कुल्हाड़ियाँ भी दे दे, उसकी बात सुनकर उसके दोस्त बहुत ही खुश हुए लेकिन उसमें एक दोस्त जो कि बहुत ही ईर्ष्यालु था वह मन ही मन परेशान हो गया

अपने दोस्त से जलदेवी द्वारा दी गयी सोने और चांदी की कुल्हाडियों के बारे में सोच – सोचकर वह भी वैसी ही कुल्हाड़ियाँ पाने की सोचने लगा और उसका मन लालच से भर उठा, रात में उसे नींद भी नहीं आयी क्योंकि वह तो बस सुबह होते ही जंगल में जाने की सोच रहा था।

अगले दिन लकड़हारे का वह ईर्ष्यालु दोस्त जंगल में नदी किनारे उसी पेड़ पर गया जहां से उसके दोस्त की कुल्हाड़ी नदी में गिरी थी और वह उस पेड़ पर जाकर लकड़ियां काटने लगा और कुछ समय बाद जानबूझकर उसने लकड़ियां काटते – काटते अपनी कुल्हाड़ी को नदी में डाल दिया और फिर पेड़ से नीचे आकर जोर जोर से रोने लगा।

कुछ ही देर में उसकी रोने की आवाज सुनकर नदी से जलदेवी प्रकट हो गयी और उससे बोलीं ‘हे मनुष्य, तुम क्यों रो रहे हो’, अपने सामने जलदेवी को देखकर वह मन ही खुश हो गया लेकिन परेशान होने का नाटक करता हुआ कहने लगा ‘देवी जी मेरी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई है जिससे मैं लकड़ियां काटकर अपने परिवार का पेट भरता हूं, अब मेरे परिवार का क्या होगा यह सोच सोच कर मैं रो रहा हूं’।

जलदेवी का ह्रदय बहुत कोमल था, उसे परेशान देखकर उन्हें दया आ गयी लेकिन फिर भी उन्होंने पहले वाले लकड़हारे की तरह ही उन्होंने इसकी भी परीक्षा लेने की सोची और वह उससे बोली ‘मैं अभी तुम्हारी कुल्हाड़ी लेकर आती हूं’।

देवी ने नदी में डुबकी लगाई और फिर कुछ ही पलों में वह एक सोने की कुल्हाड़ी लेकर उस किसान से पूछने लगीं ‘मनुष्य जरा ध्यान से देखो, क्या यही तुम्हारी कुल्हाड़ी है’। जलदेवी के हाथ में सोने की कुल्हाड़ी को देखकर वह बहुत खुश हो गया लेकिन सोचने लगा ‘मेरे मित्र को तो देवी ने कई कुल्हाड़िया दी थी लेकिन मेरे लिए यह एक ही लायी हैं, इसे ही ले लेता हूँ इन्हें क्या पता की मेरी कुल्हाड़ी कौन सी थी’।

मन में लालच से भरा हुआ वह जलदेवी से बोला ‘हां हां देवी जी, यही मेरी कुल्हाड़ी है’, उसके मुंह से यह सुनते ही जलदेवी को बहुत ही गुस्सा आया और वह नदी के बीच में जाकर कहने लगी ‘मनुष्य तुम तो बहुत ही लालची हो, यह तो तुम्हारी कुल्हाड़ी नहीं है फिर भी तुमने लालच में आ सोने की कुल्हाड़ी को देख कर मुझसे यह कहा कि यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है’।

जलदेवी की बात सुनकर लकड़हारे का वह लालची दोस्त बहुत ही शर्मिन्दा हो उठा, अब उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह देवी को क्या कहे। जलदेवी बड़े गुस्से में आगे बोलीं ‘तुम्हारे इस लालच की अब यही सजा है कि तुम्हें मैं कोई कुल्हाड़ी नहीं दूंगी, जाओ तुम ऐसे ही अपने घर वापस जाओ’, और इतना कहकर वह नदी में अंतर्ध्यान हो जाती हैं।

अपने लालच के प्रदर्शन से शर्मिन्दा वह मनुष्य भी अपने हाल पर पछताता हुआ और अपनी भी कुल्हाड़ी को खोकर वापस अपने घर को लौट जाता है।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए और हमेशा सही और सच का ही साथ देना चाहिए जैसे उस लकड़हारे ने लालच नहीं किया और पूरी इमानदारी से अपनी लोहे की कुल्हाड़ी के आगे सोने व चांदी की कुल्हाड़ी को भी मंज़ूर नहीं किया।